श्री विश्वकर्मा वंशावली

जैसे राम् कृष्णा आदि ईश्वर के अनेक अवतार पुराणों में वर्णन किये गये है, वैसे ही विश्वकर्मा भगवान के अवतारों का वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड में महादेव जी ने पार्वती जी से कहा है कि हे पार्वती मैं आप से पाप नाशक कथा कहता हूं। इसी कथा में महादेव जी ने पार्वती जी को विश्वकर्मेश्वर लिगं प्रकट होने की कथा कहते हुए त्वष्टा प्रजापति के पुत्र के संबंध में कहाः

प्रथम अवतार

विश्वकर्माSभवत्पूर्व ब्रह्मण स्त्वपराSतनुः । त्वष्ट्रः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्व कर्मस ।।

अर्थः प्रत्यक्ष आदि ब्रह्मा विश्वकर्मा त्वष्टा प्रजापति का पुत्र पहले उत्पन्न हुआ और वह सब कामों मे निपुण था।

दूसरा अवतार

स्कन्द पुराण प्रभास खंड सोमनाथ माहात्म्य सोम पुत्र संवाद में विश्वकर्मा के दूसरे अवतार का वर्णन इस भातिं मिलता है। ईश्वर उचावः

शिल्पोत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि श्रृणु षण्मुख यत्नतः । विश्वकर्माSभवत्पूर्व शिल्पिनां शिव कर्मणाम् ।।
मदंगेषु च सभूंताः पुत्रा पंच जटाधराः । हस्त कौशल संपूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।

एक समय कैलाश पर्वत पर शिवजी, पार्वती, गणपति आदि सब बैठे थे उस समय स्कन्दजी ने गणपतिजी के रत्नजडित दातों और पार्वती जी के जवाहरात से जडें हुए जेवरों को देखकर प्रश्न किया कि, हे पार्वतीनाथ, आप यह बताने की कृपा करे कि ये हीरे जवाहरात चमकिले पदार्थो किसने निर्मित किये? इसके उत्तर में भोलानाथ शंकर ने कहा कि शिल्पियों के अधिपति श्री विश्वकर्मा की उत्पति सुनो। शिल्प के प्रवर्त्तक विश्वकर्मा पांच मुखों से पांच जटाधरी पुत्र उत्पन्न हुए जिन के नाम मनु, मय, शिल्प,त्वष्टा, दैवेज्ञ थे। यह पांचों पुत्र ब्रह्मा की उपासना में सदा लगें रहतें थे इत्यादि।

तीसरा अवतार

आर्दव वसु प्रभास नामक को अंगिरा की पुत्री बृहस्पति जी की बहिन योगसिद्ध विवाही गई और अष्टम वसु प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम विश्वकर्मा हुआ जो शिल्प प्रजापति कहलाया इसका वर्णन वायुपुराण अ.22 उत्तर भाग में दिया हैः

बृहस्पतेस्तु भगिनो वरस्त्री ब्रह्मचारिणी । योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता चरते सदा ।।
प्रभासस्य तु सा भार्या वसु नामष्ट मस्य तु । विश्वकर्मा सुत स्तस्यां जातः शिल्प प्रजापतिः ।।

मत्स्य पुराण अ.5 में भी लिखा हैः

विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्प प्रजापतिः । प्रसाद भवनोद्यान प्रतिमा भूषणादिषु । तडागा राम कूप्रेषु स्मृतः सोमSवर्धकी ।।

अर्थः प्रभास का पुत्र शिल्प प्रजापति विश्वकर्मा देव, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब, बावडी और कुएं निर्माण करने देव आचार्य थे।

आदित्य पुराण में भी कहा है किः

विश्वकर्मा प्रभासस्य धर्मस्थः पातु स ततः ।।

महाभारत आदि पर्व विष्णु पुराण औरं भागवत में भी इसका उल्लेख किया गया है।

विश्वकर्मा ऋषि

विश्वकर्मा नाम के ऋषि भी हुए है। विद्वानों को इसका पूरा पता है कि ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त दिया हुआ है, और इस सूक्त में 14 ऋचायें है इस सूक्त का देवता विश्वकर्मा है और मंत्र दृष्टा ऋषि विश्वकर्मा है। विश्वकर्मा सूक्त 14 उल्लेख इसी ग्रन्थ विश्वकर्मा-विजय प्रकाश में दिया है। 14 सूक्त मंत्र और अर्थ भावार्थ सब लिखे दिये है। पाठक इसी पुस्तक में देखे लेंवे। य़इमा विश्वा भुवनानि इत्यादि से सूक्त प्रारम्भ होता है यजुर्वेद 4/3/4/3 विश्वकर्मा ते ऋषि इस प्रमाण से विश्वकर्मा को होना सिद्ध है इत्यादि। पाठकगण। वेदों और पुराणों के अनेक प्रमाणों से हम विश्वकर्मा को परमात्मा परमपिता जगतपिर्त्ता, सृष्टि कर चुके तथा विश्वकर्मा के अवतारों को भी पुराणों से बता चुके है। अब भी कोई हटधमीं करें तो हमारे पास उनका इलाज करने का तरीका भी है। इन टकापन्थी भोजन भट्टों ने बहुत धूर्तता की है। विश्वकर्मा देव की अवेहलना करने से ही इस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे है। न इनके पास खुद की उत्पत्ति है यह टकशाली ब्राह्मण यह देख पद्म पुराण के वचनों पर तनिक ध्यान नहीं देते, देखों कितना साफ कहा है। अर्थ विष्णु और विश्वकर्मा में कोई भेद नही।

विश्वकर्मा अनेक नामों से विभूषित

जगतकर्ता विश्वकर्मा भौवन विश्वकर्मा, ऋषि विश्वकर्मा धर्म ग्रंन्थों में अनेक अवतरण आये है। विषय अनेकानेक नामॆ में बटा हुआ है विश्वकर्मा ब्राह्मण कर्म है, अर्थात विश्वकर्मा सन्तान कहने का दावा करने वाले तथा अपने को पांचाल शिल्पी ब्राह्मण बताने वाले खरे ब्राह्मण है। यहां हम धर्मग्रन्थों के प्रमामों को देकर अन्त में ग्रथों के आधार पर भृगु, अंगिरा, मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ आदि की वंशावली भी सप्रमाण दिखायेंगे।

प्राचीन धर्म शास्त्रों में

शिल्पज्ञ, विश्वकर्मा ब्राह्मणों को रथकार वर्धकी, एतब कवि, मोयावी, पाँचाल, रथपति, सुहस्त सौर और परासर आदि शब्दों में सम्बोधित किया गया था। उस समय आजकल के सामान लोहाकारों, काष्ठकारों और स्वर्णकारों आदि सभी के अलग-अलग सहस्त्रों जाति भेद नहीं थे। प्राचीन समय में शिल्प कर्म बहुत उंचा समझा जाता था, क्योंकि धर्मग्रंथों की खोज में हमें पता चलता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों ही वर्ण रथ कर्म अर्थात शिल्प कर्म करतें थे। हम यहां विश्वकर्मा ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्य विषयक कुछ प्रमाण देने से पूर्व यह उचित समझते है कि रथकार, पाचांल, नाराशस इत्यादि शब्दों के विषय में कुछ थोडा समजझा दें। जिससे आगे को जो धर्म शास्त्रों के प्रमाण हम दिखायेंगे उनमें जब इन शब्दों में से कोई आवे तो हमारे पाठकों को समझने में कठिनाई न पडें।

रथकार

यह शब्द प्राचीन धर्मग्रन्थों में अनेक स्थलों पर आया है, और उनकें शिल्पी ब्राह्मण के स्थान में प्रयोग हुआ है। अर्थात लोककार, काष्टकार, स्वर्णकार, सिलावट और ताम्रकार सब ही काम करने वाले कुशल प्रवीण शिल्पी ब्राह्मण का बोध केवल रथकार शब्द से ही कराया गया है, और यही शब्दों वेदों तथा पुराणों में भी शिल्पज्ञ ब्राह्मणों के लिए लिखा गया है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 6 में रथकार शब्द का प्रयोग हुआ हैः

सद्योजाता दि पंचभ्यो मुखेभ्यः पंच निर्भये ।। विश्वकर्मा सुता होते रथ कारास्तु पचं च ।।
तास्मिन् काले महाभागो परमो मय रुप भाक् ।। पाषणदार कंटकं सौ वर्ण दशकं तदा ।।
काष्ठं च नव लोहानि रथ कृद्यों ददौ विभुः ।। रथ कारास्तदा चक्रुः पचं कृत्यानि सर्वदा ।।
षडदशनाद्य नुष्ठानं षट् कर्मनिरताश्च ये ।।

अर्थः शंकर बोले कि हे स्कंन्द, सद्योजात् वामदेव, तत्पुरूष, अधीर और ईशान यह पांच ब्रह्म सज्ञंक विश्वकर्मा के पांच मुखों से पैदा हुए। इन विश्वकर्मा पुत्रों की रथकार सज्ञां है। अनेक रूप धारण करने वाले उस विश्वकर्मा ने अपने पुत्रों को टांकी आदि दस शिल्प आयुध अर्थात दस औजार सोना आदि नौ धातु लोहा, लकडीं आत्यादि दिया। उसके यह षटेकर्म करने वाले रथकार सृष्टि कार्य के पंचनिध पवित्र कर्म करने लगे।

रथकार शब्द क ब्राह्मण सूचक होने के विषय में व्याकरण में भी अष्टाध्यायी पाणिनि सूत्र पाठ सूत्र - शिल्पिनि चा कुत्रः 6/2/76 सज्ञांयांच 6/2/77
सिद्धांत कौमुदी वृतिः- शिल्पि वाचिनि समासे अष्णते ।
परे पूर्व माद्युदात्तं, स चेदण कृत्रः परो न भवति ।
ततुंवायः शिल्पिनि किम- काडंलाव, अकृत्रः किं-कुम्भकारः ।
सज्ञां यांच अणयते परे तंतुवायो नाम कृमिः ।
अकृत्रः इत्येव रथकारों नाम ब्राह्मणः पाणिनिसूत्र 4/1-151 कृर्वादिभ्योण्यः ।

ब्राह्मण जाति सूचक अर्थ को बताने वाले जो गोत्र शब्द गण सूत्र में दियें है, वह यह हैः कुरू, गर्ग, मगुंष, अजमार, ऱथकार, बाबदूक, कवि, मति, काधिजल इत्यादि, कौरव्यां, ब्राह्मणा, मार्ग्य, मांगुयाः आजमार्याः राथकार्याः वावद्क्याः कात्या मात्याः कापिजल्याः ब्राह्मणाः इति सर्वत्र।

तात्पर्य यह है कि व्याकरण शास्त्र में भी रथकार शब्द को आर्य गोत्र, ब्राह्मण जाति बोधक सिद्ध किया हुआ है और उसका उदाहरण भी रथकारों नाम ब्राह्मण दिया है। जिससे सिद्ध किया गया है कि रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है क्योकिं- रथं करोतिं इति रथकारः। अर्थात रथ निर्माण करने वाले ब्राह्मण का बोध प्राचीन ग्रथों में रथकार शब्द से होता है। यहां यह भी लिख देना जरूरी जान पडतां है कि स्मृतियों में रथकार एक संकीर्ण जाति को भी लिखा है, परन्तु जहां पवित्र देव शिल्प आदि का वर्णन आता है।वहां शिल्पी ब्राह्मण संतति रथकार का ही मतलब होता है। आपको रतकार विषय में शास्त्र के मन्त्र और रथकार का प्राचीन समय में जो मान, समान्न प्रतिष्ठा थी उस समय विश्वकर्मा का रथकार रूप विस्तृत था। राजे महाराजा सभी विश्वकर्मा रथकारों को आदर देते थे क्योंकि कलाकार राष्ट्रं के निर्माण करने मे अग्रसर रखतें थे यह ब्राह्मण वर्ग रथकारों में था।

पांचाल

रथकार शब्द के विषय के नमूने के तौर पर ऊपर उदाहरण देकर बता चुके है। अब इसी भातिं एक दो उदाहरण पांचाल शब्द के विषय में भी देकर बतावेंगे कि विश्वकर्मा ब्राह्मणों को प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पांचाल भी कहा गया है। बराह पुराण में कहा हैः

पांचाल ब्राह्मणेति हासः कथं ।। तत्र सुवर्णालंकार वाणिज्यों प जीविनः पांचाल ब्राह्मणा ।।

शैवागम में कहा हैः

पंचालाना च सर्वेषामा चारोSप्य़थ गीयते । षट् कर्म विनिर्मित्यनी पचांलाना स्मुतानिच ।।

रूद्रयामल वास्तु तन्त्र में शिवाजी महाराज ने कहा किः

शिवा मनुमंय स्त्वष्टा तक्षा शिल्पी च पंचमः ।। विश्वकर्मसुता नेतान् विद्धि प्रवर्तकान् ।।
एतेषां पुत्र पौत्राणामप्येते शिल्पिनो भूवि ।। पंचालानां च सर्वेषां शाखास्याच्छौन कायनो ।।
पंचालास्ते सदा पूज्याः प्रतिमा विश्वकर्मणः ।। रूद्रवामल वास्तु तन्त्र व्रत्यादि ।।

उपरोक्त प्रमाणों में पाचांल शब्द का प्रयोग विश्वकर्माके स्थान में किया गया है। अर्थात् रथकार और पांचाल दोनों शब्द विश्वकर्मा ब्राह्मण बोधक ही है।

स्थापत्य

यज्ञ कर्म और देव कर्म संबंधी कर्म में कहीं कहीं विश्वकर्मा पाचांल ब्राह्मण की सज्ञां स्थापत्य भी कही गई है। जैसे भागवत स्कन्द 3 में स्थापत्य विश्वकर्म शास्त्र लिखा है, इसका यही अर्थ है कि यज्ञ सम्बधी और देव संबधी पवित्र शिल्प कर्म करने वाले विश्वकर्मा सन्तान ब्राह्मण है। इसकी पुष्टि अमर कोष के प्रमाण से भी होती है।

देखो - अमर कोष अ. ब्रह्मवर्ग - सगींष्प तोष्टय्या स्थपतिः

अर्थः बृहस्पति सज्ञंक इष्ट अर्थात् बृहस्पति सज्ञां वाले यह कर्म करने वाले बृहस्पति गुरू को कहते है और दूसरे बृहस्पति विश्व-कर्म कुलोत्पन्न शिल्पाचार्य हुए है।

नाराशंस

अंगिरा महर्षि को ऋग्वेद में नाराशंस कहा है इसका प्रमाण ऋग्वेद अ. 8/2/1 मे देखो - नराः अगिंरसः महर्षयः मनुष्य जाता वुत्पन्नत्वात् ते शंस्यते इति नाराशंसः।

बौधायन श्रौत् सूत्र के महा प्रवराध्याय में भी लिखा है - वसिष्ट शुनिकात्रि भृगु कण्व वाघ्रश्चाधूल राजन्य वैश्य इति नाराशंसः ।।

गोत्र प्रवर दर्पण में भी यह शब्द पाया जाता है - भृगु गणे त्वष्टयाः अग्ने नाराशंसान् व्याख्या स्यामः। वशिष्ठ शुनकात्रिभृगु काण्व बाघ्रश्चाधूल इति ।।

नाराशंस शब्द पितर सज्ञां में भी प्रयुक्त हुआ है। देखो ऋग्देव अध्याय 8/1/16/3 - मनोन्वा हुवामुहे नाराशंसेन सोमेने ।।

भाष्य - नरेः शस्यते इति नाराशंसः पितरः ।।

आश्वलायन श्रौत सूत्र में भी नाराशंस का प्रयोग मिलता है। देखो सूत्र 5/6/30 - आप्यायिताश्चिमतान् सादयंति ते नाराशंस भवति ।।

उपरोक्त अनेक प्रमाण हमने रथकार पांचाल, रथापत्य और नाराशंस शब्दों के प्रयोग को जिखाकर यह सिद्ध किया हा कि यह सब जहां कही भी धर्म ग्रन्थों में भी लिखे गये है। वहा वह शिल्पी ब्राह्मणों के बोधक है। अब आगे हम यह सिद्ध करके दिखोयेगें कि विश्वकर्मा वंश के ब्राह्मण होने के और भी अनेक प्रमाण सनातनी धर्म ग्रन्थों मे खोजने से मिले सकते है। उपरोक्त ऱथकार, पांचाल, रथकार, नाराशंस यह सब स्तंभ प्रमाण सग्रंह अर्थात विश्वकर्म - ब्राह्मण - भास्कर से संग्रहीत किए है। यह पुस्कत स्वः जयकृष्ण मणिठिया, शर्मा, गुरूदेव की सग्रंहीत है जिसे विश्वकर्मा-विजय-प्रकाश में कई स्तम्भ संग्रहीत कर प्रकाशित किये है।

भृगु ऋषि कुल

वायु पुराण अध्याय 4 के पढने से यह बात सिद्ध हो जाती है कि वास्तव में विश्वकर्मा सन्तान भृगु ऋषि कुल उत्पन्न है देखों लिखा हैः

भार्ये भृगोर प्रतिमे उत्तमेSभिजाते शुभे ।। हिरण्य कशिपोः कन्या दिव्यनाम्नी परिश्रुता ।।
पुलोम्नश्चापि पौलोमि दुहिता वर वर्णिनी ।। भृगोस्त्वजनयद्विव्या काव्यवेदविंदा वरं ।।
देवा सुराणामाचार्य शुक्रं कविसुंत ग्रहं ।। पितृंणा मानसी कन्या सोमपाना य़शस्विनी ।।
शुक्रस्य भार्यागीराम विजये चतुरः सुतान् ।। ब्राह्मणे मानसी कन्या सोमपाना यशस्विनीः ।।
तस्या मेव तु चत्वार पुत्राः शुक्रस्य जज्ञिर ।। त्वष्टावरूपी द्वावेतौ शण्डामर्कोतु ताबुभो ।।
ते तदादित्य सकाया ब्रह्मकल्पा प्रभावतः ।।

अर्थः हिरण्यकश्यप की बेटी दिव्या और पुलोमी की बेटी पौलीमी उत्तम कुलीन, यह दोनों मृग ऋषि को विवाही गई। दिव्या नाम वाली स्त्री के गर्भ से शुक्राचार्य पैदा हुए। सोम्य पितरों की मानसी कन्या अगीं नाम वाली शुक्राचार्य को विवाही गई। शुक्राचार्य जी के सूर्य के समान ब्रह्म तेज वाले त्वष्टा, वस्त्र, शंड और अर्मक यह पुत्र पैदा हुए, इन चारो मे त्वष्टा ब्रह्म तेज से विशेष सुक्त था । अर्थात त्वष्टा में ब्रह्म तेज अधिक था। पाठक गण इससे स्पष्ट है कि त्वष्टा भृगु कुल मे पैदा हुआ और ब्राह्मण था, ब्राह्म तेज की विशे,ता ब्राह्मणत्व को साफ बता रही है। अब इसी कुल में त्वष्टा से विश्वकर्मा का जन्म सुनों।

त्रिशिरा विश्वरूपस्तु त्वष्टाः पुत्राय भवताम् ।। विस्वरूपानुजश्चापि विश्वकर्मा प्रजापतिः ।।

अर्थः त्वष्टा प्रजापति के त्रिशिरा जिसका नाम विश्वरूप था बडा पराक्रमी औऱ उसका भाई विस्वकर्मा प्रपति यह दो पुत्र इसी विश्वकर्मा प्रजपति के विषय में स्कन्द पुराण रे प्रभास खंड में यह लिखा है।

विश्वकर्म महदभूतं विश्वकर्माणाम् मदंगेषु च सम्भूताः ।। पुत्रा पचं जटाधराः हस्त कौशल सम्पूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।

अर्थः शिल्पियों में विश्वकर्मा बडा महान हुआ, जिसके पांच जटाधारी पुत्र हुए। इन्ही विश्वकर्मा के पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ का वायु पुराण अध्याय, 4 में उल्लेख किया हुआ है इन्हीं पाचं पुत्रों की सतांन जो हुई वह सब भृगु कुलोत्पन्न विश्व-ब्राह्मण या पांचाल ब्राह्मण कहलाई।

पाठकगण ध्यान दें कि उपरोक्त विदित वंश बिलकुल साफ-सुथरा और खरा है। इसमें कोई अण्ड-बण्ड ऐसी उत्पत्ति नहीं है। जैसा कि इस पुस्तक की भूमिका में हम अकसाली ब्राह्मणों की उत्पत्ति जाति भास्कर और ब्राह्मणोंत्पत्ति मार्तण्ड के अधार पर दिखा चुके है। पाठको की जानकारी के लिए हम यहां भृगु कुल में उत्पन्न हुए सब ही ऋषियों का उत्पत्ति क्रमानुसार दिखाते है।

इस कुल में भृगु, च्यवन, दिवोदास और गृत्समद और शौनक यह वेद मत्रं के द्रष्टा हुए है।

भृगुः ब्रह्मदेव का मानस पुत्र क् शाप से मर गये तब ब्रह्मदेव ने उनको फिर उत्पन्न किया और वह वरूण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न हुए और वरूण ने इनको अपना पुत्र ग्रहण किया। इसी कारण यह वारूणी भृगु के नाम से प्रसिद्ध हुए। विशेष जिसे देखना हो वायुपुत्र अ. 4 मत्स्य पुराण अ.252 महाभारत अनुशासन पर्व अ.85 निरूक्त दैवज्ञ कांड भाग पृ. 193 औऱ भारत वर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में देख सकतें है।

भार्गवः भृगु ऋषि के पुत्र सुक्राचार्य का ही नाम भार्गव है।यह देवों और दत्यों के दोनों के ही पुरोहित अर्तात् आचार्य थे। इन्होंने शिल्प शास्त्र का ओशनस नामक ग्रंथ भी लिखा है। वायु पुराण और बृहत्संहिता अ.50 में विशेष रूप से देख सकतें हैं।

त्वष्टाः शुक्राचार्य के चार पुत्रों में सें थे। इनमें अधिक ब्रह्मतेज था। विश्वरूप और विश्वकर्माइनके दो पुत्र थे।

शौनकः यह शुनक ऋषि के पुत्र और ऋग्वेद के द्रष्टा ऋषि थे। पांचालो की शौन कायनी शाखा इन्हीं से चली है।

उपरोक्त सब ही ऋषि शिल्प कार्य करते थे। गोत्र प्रवर दीपिका में इस भृगु कुल के गोत्र प्रवर इस प्रकार दिये है।

भृगु ऋषि - भार्गव, च्यवन,, देवो दासेति।

वाध्न्यस्वा - भार्गव, वाध्न्यश्वा, देवो दासेति।

भार्गव - भार्गव, त्वष्टा, विश्वरूपेति।

वाधूल - भार्गव, वैतहव्य,सावेतसेति।

शुनक - शौनक, भार्गव, शौन हौत्र गार्त्समदप्ति।

किसी किसी ग्रन्थकार जैसे बोधयन नामक सूत्रकार ने वरिष्ठ शुनक अत्रि, भृगु, कण्व, वाध्न्यश्वा, वाधूल,यह गोत्र बी नाराशंस पांचालों के आर्षेय गोत्र लिखे है।

 

केवल आंगिरस कुल के प्रसिद्ध ऋषि

उपरोक्त अगिंरा वशांवली दी गई है, यह प्रमाण-सग्रंह से उधृत है। अगिंरा ऋषि ब्रह्मा, के मुख से उत्पन्न हुय़े। इनका वर्णन वेद, ब्राह्मण ग्रथं, श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत और सभी पुराणों में उल्लेख है। अगिंरा कुल परम श्रेष्ठ कुल है।

अंगिरा

अंगिरा ऋषि के विषय में मत्स्य पुराण, भागवत, वायु पुराण महाभारत और भारतवर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में वर्णन किया गया है। मत्स्य पुराण में अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति अग्नि से कही गई है। भागवत का कथन है कि अंगिरा जी ब्रह्मा के मुख से यज्ञ हेतु उत्पन्न हुए। महाभारत अनु पर्व अध्याय 83 में कहा गया है कि अग्नि से महा यशस्वी अंगिरा भृगु आदि प्रजापति ब्रह्मदेव है। ऋग्वेद 10-14-6 मे कहा है किः

अमगिरासों नः पितरो नवग्वा अर्थर्वाणो भृगबः सोम्यासः। तेषां वयं सुभतौं यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसः स्यामः।।

अर्थः जिसके कुल में भरद्वाज, गौतम और अनेक महापुरूष उत्पन्न हुए ऐसे जो अग्नि के पुत्र महर्षि अंगिरा बडे भारी विद्वान हुए है उनके वशं को सुनों। अंगिरस देव धनुष और बाण धारी थे, उनको ऋषि मारीच की बेटी सुरूपा व कर्दम ऋषि की बेटी स्वराट् और मनु ऋषि कन्या पथ्या यह तीनों विवाही गई। सुरूमा के गर्भ से बृहस्पति, स्वराट् से गौतम, प्रबंध, वामदेव उतथ्य और उशिर यह पांछ पुत्र जन्में, पथ्या के गर्भ से विष्णु संवर्त, विचित, अयास्य असिज, दीर्घतमा, सुधन्वा यह सात पुत्र उत्पन्न हुए। उतथ्य ऋषि से शरद्वान, वामदेव से बृहदुकथ्य उत्पन्न हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र ऱथकार में बडें कुशल देवता थे, तो भी इनकी गणना ऋषियों में की गई है। बृहस्पति का पुत्र महा य़शस्वी भरद्वाज हुआ, यह सब अंगिरा भृगु आदि द्व शिल्प के निर्माण वाले रथकार नाम से प्रसिद्ध हुए। इसमे स्पष्ट सिद्ध हो गया की प्राचीन काल में शिल्पी ब्राह्मणों रथकार भी कहा करते थे और रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है,इस विषय में हम पूर्व पर रथकार शब्द को व्याकरण की कसौटि पर कसकर ब्राह्मण बोधक सिद्ध कर चुके है।

महाभारत अमुसाशन पर्व अध्याय पर्व अध्याय 83 में अंगिरा ऋषि के आठ पुत्रों की आग्नेय सज्ञां होने के विषय में यह उल्लेख हैः

अष्टौ चांगिरसः पुत्राः आग्नेयास्तेSप्युवाह्रताः। बृहस्पतिरूतथ्यश्य पयस्यः शांतिरेवच। धोरो विरूपः संर्वतः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः।

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