श्री विश्वकर्मा प्रश्नावली

निर्माण के देवता विश्वकर्मा जी के विषय में अनेकों भ्रांतियां है, बहुत ये विद्वान विश्वकर्मा इस नाम को एक उपधिं मानते है, क्योंकि सस्कृंत साहित्य मे बि समकालीन कई विश्वकर्माओ का उल्लेख मिलता है ।

निःसदेंह यह विषय निर्भ्रय नही है। हम स्वीकार करते है प्रभास पुत्र विश्वकर्मा, भुवन पुत्र विश्वकर्मा तता त्वष्टापुत्र विश्वकर्मा आदि अनेकों विश्वकर्मा आदि अनेंको विश्वकर्मा हुए है । यह अनुसंधान का विषय है । सम्पूर्ण सस्कृंत साहित्य का अवलोकन किया जाय, विदेशो मे भी खोज की जाय, क्योकि यूरोपिय लोग भी लिश्वकर्मा कों “ फॅदर आँफ आर्टस ”(father of Arts) मानते है यह उत्कृष्ट विद्वानों का महान कार्य है, परन्तु अब तक की खोज के आधार पर जों निष्कर्ष सम्मुख आया है उसी के आधार पर कहा जा सकता है कि मूल पुरुष विश्वकर्मा के पश्चात् ही उपाधि प्रचलित होती है। प्रारंभ से नहीं । विश्वकर्मा ही नहीं इन्द्र, व्यास, ब्रह्मा, जनक, धन्वन्तरि आदि अनेकों ऐसी उत्कृष्ट विभूतिययँ उपाधियों के रुप में प्रचलित हैं, परन्तु इनका मूल पुरुष अवश्य है। जैसे देवराज नामक इन्द्र द्वारा जब विश्वकर्मा पुत्रों की हत्या करकें ब्रह्महत्या का पता लगा तो ऋषियों औरं देवताओं ने मिलकर देवराज इन्द्र को पदच्युत कर इन्द्र को गद्दी पर आसीन कर दिया, इसी प्रकार सीताजी को जिस राजा जनक की पुत्री माना जाता है उसका नाम राजा सीरध्वज था । व्यास और ब्रह्मा उपाधि धारकों के लिये भी मूल पुरुष की खोज की जा सकती हैं ।

हमारा उद्देश्य तो यहां विश्वकर्मा का परिचय कराना है, माना कई विश्वकर्मा हुए हंत और आगे चलकर विश्वकर्मा के गुणो को धारण करने वाले ऋष्ठ पुरुष को विश्वकर्मा की उपाधि से अलंकृत किया जाने लगा हो तो बात भी मानी जानी चाहिये । शास्त्र में भी लिखा हैः-

स्थपति स्थापनाई : स्यात् सर्वशास्त्र विशारद : । न हीनागडों अतिरिक्तगडों धार्मिकस्तु दयापर:।। 1 ।।

अमात्सर्यो असूयश्चातन्द्रियतस्त्वभिजातवान् । गणितज्ञ : पुराणज्ञ सत्यवादी जितेन्द्रिय:। 2 ।।

गुरुभक्ता सदाहष्टा: स्थपत्याज्ञानुगा: सदा । तेषाम्व स्तपत्याख्यो विश्वकर्मेति सस्मृत:।। 3 ।।

अर्थः- जो शिल्पी निर्माण कला में सिध्दहस्त सन्पूर्ण शास्त्रों का पूर्ण पंडित हो जिसके शरीर का कोई अवयव न अधिक हो न कम हो, दयालु और धर्मात्मा तथा कुलीन हो ।।1।। जो अहंकार करनेवाले ईर्ष्यालु और प्रमादी न हो, गणित विद्दा का पुर्ण पडिंत हों, वेंदों के व्याख्यान रुप ब्रह्मण ग्रथों और इतिहास में पारंगत हो, सत्यवादी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला आज्ञाकारी हो इस प्रकार के गुणों से युक्त रचियता को विश्वकर्मा कहते है ।।3।। मयमतम् के कथन से स्पष्ट होता है कि कालान्तर में विश्वकर्मा एक उपाधि प्रचलित हो गई थी, परन्तु इसका यह अर्थ नही है कि विश्वकर्मा नाम का कोई मूल पुरुष या पुरुष हुआ ही न हो !विव्दानों में मत भेद इस पर भी है कि मूल पुरूष विश्वकर्मा कौन से हुए ? कुछेक विव्दान अंगिरा पुत्र सुधन्वा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं तो कुछ भुवन पुत्र भौवन विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते है, परन्तु महाभारत के खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभास पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते है , परन्तु महाभारत कें खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभास पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानतें है । स्कंद पुराण प्रभास खण्ड के निम्न श्लोक की भांति किंचित पाठ भेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता है-

बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवना ब्रम्हवादिनी । प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च । विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापतिः ।।16।।

अर्थः महर्षि अंगिरा कं ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रम्हविद्या जानने वाली थी वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभात की पत्नी बनी और उसमें सम्पूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ । पुराणों में कहीं योगसिद्धा, वरस्त्री नाम भी बृहस्पति की बहन का लिखा है ऐसा पाठभेद अवश्य है ।

आप आदि विश्वकर्मा किसे मानतें है ?

हम प्रभात पुत्र भुवना माता से उत्पन विश्वकर्मा को ही आदि या मूल विश्वकर्मा मानते है।

यह बात आप किस आधार पर कहते है?

हजारों वर्ष पहले महाराज भोज देव ने जो सस्कृंत के प्रकांड पडिंत थे वास्तु विद्या का ग्रंथ “ समरागंण सूत्रधार ” लिखा था उसमें लेखक ने अपना इष्टदेव भगवान विष्वकर्मा को माना है उन्होने ग्रंथ के आदि में अपने इष्ट का स्वतवन करतें हुए लिखा है-

तदेशः त्रिदशाचार्य सर्व सिध्दि प्रवर्तकः । सुतः प्रभासस्य विभो स्वस्त्रीयश्च बृहस्पतेः ।।

अर्थः शिल्प शास्त्र का कर्ता वह ईश विश्वकर्मा देवताओं का आचार्य है,सम्पूर्ण सिध्दियों का आचार्य है, वह प्रभास ऋषि का पुत्र है और महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र देवगुरु बृहस्पति का भानजा है। अर्थात अंगिरा का दौहितृ (दोहित) है। अगिंरा कुल से विश्वकर्मा का संबंध तो सभी विद्वान स्वीकार करतें है। भोजदेव के प्रमाण में किसी को शंका यों नही होनी चाहिये कि आधुनिक काल के महाविद्वान महर्षि दयानन्दने लिखा है- “महाभारत के पश्चात हजारों वर्ष व्यतीत होने पर ङोज को वेदों का ज्ञान था। भोजकाल मे ही शिल्पियों ने काठ का घोडा बनाया था। जो एक घन्टे मे सत्ताईस कोस चलता था । ऐसा ही एक पखां बनाया था बिना मनुष्य के चलाये पुष्कल वायु देता था । यदि ये पदार्थ आज तक बने रहते तो अंग्रेजों को इतना गर्व नही होता । भोजकाल में किसी ने वेद विरुध्द पुराण खडा किया था तो राजा भोज ने उसके हाथ कटवा दिये थे ।

हमारा कथन यह है कि जब हजारों वर्ष पहले तक आदि विश्वकर्मा को महर्षि प्रभाव का पुत्र मानने का प्रचलन था या परम्परा थी तो अब इस काल में शंका क्यों की जाती है ? विश्वकर्मा कोई आधुनिक काल का देवता तो है नहीं ये तो वैदिक कालीन है। ऋग्वेद जो विश्व का सबसे प्रचीन ग्रथं माना जाता है उसमे चौदह ऋताओ वाला विश्वकर्मा सूक्त है। यदिपुराणो की वेदव्यास की रचना माना जाये तो पद्मपुराण भू खण्ड के इन शब्दों पर विचार करें- सर्व देवेषु यत्सूक्तं पठ्यते विश्वकर्मणः। चतुर्दशा वृतेनौनें यइमेत्यादिना यजेत् ।।2।। अर्थातसबी देवगणं विश्वकर्मा संबंधी जिस सूक्त का पाठ कर यजन करतें है वह8 सूक्त यइमाभुवनानि मंत्र से आरंभ होता है और ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 82 के सातवें मत्रं तक 14 ऋचाओं में पूर्ण होता है । यास्काचार्य ने भी निरक्त मे विश्वकर्मा के सार्वभौम यज्ञ का वर्णन करते हुए लिखा है- तदभिवादिनी एषा ऋक् भवति । यइमा विश्वा भुवनानि जुहवत इति । इस कथन में भी ऋग्वेद के यइमा शब्दों से आरंभ होने वाती ऋचा का उल्लेख है जिसके द्वारा आरंभ करके सूक्त के चौदहों मत्रों से यज्ञ सम्पन्न हुआ ।चौदह मत्रों का यह सूक्त और इसका देवता तथा ऋषि तीनों ही विश्वकर्मा नाम से ऋग्वेद में उल्लिखित है। हजारों-हजारों वर्षों के ये शास्त्रीय प्रमाण सिद्ध करते है कि निर्माण के देवता विश्वकर्मा की पूजा के प्रसंग में अत्यतं प्राचीन काल से यजन याजन होते रहे है । भारतीय इतिहास में इतनी प्राचीन वैदिक पूजा पद्धती और किसी देवता की नही मिलती ।

सूक्त का क्या अर्थ है और वेदों में कितने सूक्त होते है ?

सूक्त शब्द सू + उक्त इस प्रकार बना है सू का उर्थ है सुन्दर ढंग से या भली प्रकार उक्त का अर्थ है कहना या बताना जिस मंत्र समूह में किसी विषय को भली प्रकार कहा जाय अर्थात सुन्दर अभिव्यकित को सूक्त कहते हैं। वेदों में सैकडो ही सूक्त हैं जैसे इन्द्र सूक्त, अग्नि सूक्त इसी प्रकार विश्वकर्मा सूक्त आदि हैं।

यह बात तो समझ में आ गई जब प्रभात पुत्र विश्वकर्मा की आदि विश्वकर्मा के रुप में हजारों वर्ष पूर्व से मान्यता रही है तो यह विवाद का विषय नही रहा । परन्तु एक शकां नए सिरे से उभरकर सामने आई है, आपने बताया विश्वकर्मा सूक्त का मंत्र द्रष्टा ऋषि भौवन है जिसे दूसरे विद्वान भुवन पुत्र विश्वकर्मा बताते हैं। प्रभास पुत्र विश्वकर्मा के साथ तो भौवन शब्द कैसे सिद्ध होगा या फिर वेदमंत्र द्रष्टा ऋषि दूसरा विश्वकर्मा मानना पडेगा ?

हमने जैसा कि पहले बताया है विश्वकर्मा का विषय गहन अनुसधांन का फिर भी भौवन शब्द का निराकरण वेद के भाष्य कर्ता शतायु विद्वान श्रीपाद दामोदर सातवलाकर ने अपनी लिखी पुस्तक “ विश्वकर्मा ऋषि का तत्वज्ञान ” में अनेंको विद्वानों के मत से इस प्रकार किया है कि प्रभात पुत्र विश्वकर्मा की माता जो देवगुरु बृहस्पति की बहन है उसका नाम भुवना होने के कागण पुत्रका नाम भौवन विश्वकर्मा माना गया है, और यही भौवन विश्वकर्मा वैदमंत्र ऋषि है । भुवना शब्द भुवन से बना है जिसका अर्थ हैं लोक । तीनों भुवनों (लोंकों) मे जिसकी ख्याति हो उसे भुवना कहते है।

आपने विश्वकर्मा को सभी देवताओं का आचार्य बताया है । हमें यह मान्यता पक्षपातपूर्ण लगती है, स्पष्टीकरण कीजिये ।

हमनें नही, महाराज भोजदेव ने अपने ग्रन्थ ‘ समरांगण सूत्रधार ’ में उन्हें तदेश त्रिदशाचार्य सरेव सिद्धी प्रवर्तकः अर्थात सम्पूर्ण सिद्धियों का जनक और देवताओं का आचार्य माना है । अष्ट सिद्धी और नव निधिंया मानी गई है । आज भी जिस समाज ऐर राष्ट के नागरिकों के शिल्प विज्ञान का ज्ञान है सम्पूर्ण सिद्धियों मौजुद है वे ही देवताओं का आचार्य है । भोजदेव ने ही क्यों पुराणों में विश्वकर्मा जी को सर्व देव मय माना हैं। स्कन्द पुराण नागर खण्ड में लिखा है,

विश्वकर्माअभवत्पूर्व ब्रह् मरस्त्वपरातनुः ।

अर्थ पूर्व काल में ब्रह्मा जी और विश्वकर्मा जी का एक ही शरीर था । यहां विश्वकर्मा को ब्रह्मा का स्वरुप माना है। वायु पुराण में आता है 'विष्णुश्च विश्वकर्माचनभिद्येतेपरस्परम्' विष्णु भगवान और विश्वकर्मा में कोई भेद नहीं मानना चाहिये । ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ बृद्धवाशिष्ठ में लिखा है माघे शुक्ले त्रयोदश्यांदिवा पुण्ये पुनर्वसौ । अष्टा विंशति में जातःविश्वकर्मा भवनि च । अर्थः-शिवाजी महाराज अपनी पत्नी पार्वती को कह रहे है माघ के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी के दिन पुनर्वस नामक नक्षत्र के अट्ठाईसवें अशं में विश्वकर्मा स्वरुप में उत्पन्न हुआ । यहां शिव अपने को विश्वकर्मा स्वरुप मे मान रहे है । पुराणों मे स्पष्ट उल्लेख है 'कृष्णश्च विश्वकर्मा च न भिद्येते परस्परम् ।' अर्थात भगवान कृष्ण और विश्वकर्मा में कोई भेद नहीं है । पुराणों के इन प्रमाणों से सभी शिरोमणि देवगण ब्रह्मा, विष्णु, शिव और भगवान कृष्ण तक विश्वकर्मा स्वरुप मे अपने को स्वीकार करतें है। देवियों मे विद्या की अधिष्ठात्री देवी प्रथम वन्दनीय मानी जाती है उसके लिये भी पुराणकार कहते है त्वाष्ट्ररुपा सरस्वती सर्व देवी भी विश्वकर्मा जी का ही स्वरुप है । पुराण तो वेदाव्यास जी महाराज के लिखे माने जाते है । जब वेदाव्यास जी सम्पूर्ण देवी देवताओं को विश्वकर्मा स्वरुप मानते है तो विश्नकरम जी को देवताओं का आचार्य मानने में किसे सन्देह हो सकता है ?

जैसा कि आपने भी माना है सभी विद्वान ऐर शास्त्रकार विश्वकर्मा जी कों अगिंरा ऋषि कुल से जोडते है परन्तु अगिंरा ऋषि को तो ब्राहण मात्र गोत्रकार षि मानते है फिर आपका ही विशेष लगाव कैसे माना जाय ?

नि:संदेह महाभारत में लिखा है भार्गवांगिरसो लोके संताल लक्षणौ इसका तात्पर्य है पृथ्वी पर सभी मनुष्य भृगु और अंगिरा की संतान है इसलिये इन ऋषियों पर सभी का अधिकार माना जा सकता है । परन्तु विश्वकर्मा वंशजों का तो अंगिरा से सीधा ही संबंध है । विश्वकर्मा ब्राहाण लोग अथर्ववेद हैं, अथर्ववेद का ज्ञान परमात्मा ने अंगिरा ऋषि द्वारा ही ब्रह्रमा और दूसरे ऋषियों तक पहुचाया है, सृष्टी के आरंभ में चार ऋषियों द्वारा ही चारों वेंदों का ज्ञान मानव मात्र के लिये दिया, ऐसा वेदों की मान्यता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामदेव और अर्थर्ववेद का ज्ञान क्रमषः अग्नि, वायु आदित्य और ऋषियों द्वारा ही मानव जाति को प्राप्त हुआ । इस बात को वेंदो के सभी विद्वान स्वीकार करतें है, चारों वेदों के चार ही उपदेव है सस्कृंत साहित्य के ग्रंथ चरणव्युह आदि में स्पष्ट उल्लेख हैं

आयुर्वेदश्चिकित्सा शास्त्रंऋग्वेदस्योपवेदः। धनु र्वेदो युद्ध शास्त्रंयजुर्वेदस्योपवेदः। गंधर्ववेद सगींत शास्त्रं सामवेदस्योपवेदः। अर्थव्दो (स्थापत्यवेदो) विश्वकर्मादि शिल्प शास्त्रं अर्थर्ववेदस्योपवेदः ।।

अर्थः ऋग्वेद का उण्वेद आयुर्वेद है जिसे चिकित्सा शास्त्र कहते है । यजुर्वेद का उपदेव धनुर्वेद है जिसे सगींत शास्त्र कहते है और अर्थर्ववेद का उपदेव अर्थर्ववेद है जिसके अन्तर्गत विश्वकर्मा का सम्पूर्ण शिल्प शास्त्र आता है । इस प्रकार हम वंशावली के साथ–साथ अथर्ववेदी होने सीधे अंगिरा ऋषि से जुड जाते है ।

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