रविवार व्रत कथा

रविवार या इतवार सप्ताह का एक दिन है । यह शनिवार के बाद और सोमवार से पूर्व आता है । यह रवि से आया है जिसका अर्थ सूर्य होता है । पंचाग के अनुसार यह अशुभ दिन है । प्रायः इस दिन कार्यालयों में अवकाश रहता है अतः सामाजीक एवम् धार्मिक कार्यक्रम रविवार को ज्यादा होते है ।

यह उपवास सप्ताह के प्रथम दिवस इतवार व्रत कथा को रखा जाता है । रविवार सूर्य देवता की पूजा का वार है । जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा के लिए रविवार का व्रत सर्वश्रेष्ठ है । रविवार का व्रत करने व कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं । मान-सम्मान, धन-यश तथा उत्तम स्वास्थ्य मिलता है । कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है ।

विधि

रविवार को सूर्योदय से पूर्व बिस्तर से उठकर शौच व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें । तत्पश्चात घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान सूर्य की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करें । इसके बाद विधि-विधान से गंध-पुष्पादि से भगवान सूर्य का पूजन करें। पूजन के बाद व्रतकथा सुनें । व्रतकथा सुनने के बाद आरती करें । तत्पश्चात सूर्य भगवान का स्मरण करते हुए सूर्य को जल देकर सात्विक भोजन व फलाहार करें ।

यदि किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाए और व्रत करने वाला भोजन न कर पाए तो अगले दिन सूर्योदय तक वह निराहार रहे तथा फिर स्नानादि से निवृत्त होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करे ।

कथा

एक बुढ़िया का नियम था प्रति रविवार को प्रातः स्नान कर, घर को गोबर से लीप कर, भिजन तैयार कर, भगवान को भोग लगा कर, स्वयं भोजन करती थी । ऐसा व्रत करने से उसका घर सभी धन धान्य से परिपूर्ण था । इस प्रकार कुछ दिन उपरांत, उसकी एक पड़ोसन, जिसकी गाय का गोबर यह बुढ़िया लाया करती थी, विचार करने लगी कि यह वृद्धा, सर्वदा मेरी गाय का ही गोबर लेजाती है । इसलिये वह अपनी गाय को घर के भीतर बांधने लगी । बुढ़िया, गोबर ना मिलने से रविवार के दिन अपने घर को गोबर से ना लीप सकी । इसलिये उसने ना तो भोजन बनाया, ना भोग लगाया, ना भोजन ही किया । इस प्रकार निराहार व्रत किया । रात्रि होने पर वह भूखी ही सो गयी । रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न में भोजन ना बनाने और भोग ना लगाने का कारण पूछा । वृद्धा ने गोबर ना मिलने का कारण बताया तब भगवान ने कहा, कि माता, हम तुम्हें सर्व कामना पूरक गाय देते हैं । भगवान ने उसे वरदान में गाय दी । साथ ही निर्धनों को धन, और बांझ स्त्रियों को पुत्र देकर दुःखों को दूर किया । साथ ही उसे अंत समय में मोक्ष दिया, और अंतर्धान हो गये । आंख खुलने पर आंगन में अति सुंदर गाय और बछड़ा पाया । वृद्ध अति प्रसन्न हो गयी । जब उसकी पड़ोसन ने घर के बाहर गाय बछडे़ को बंधे देखा, तो द्वेष से जल उठी । साथ ही देखा, कि गाय ने सोने का गोबर किया है । उसने वह गोबर अपनी गाय्त के गोबर से बदल दिया । रोज ही ऐसा करने से बुढ़िया को इसकी खबर भी ना लगी । भगवान ने देखा, कि चालाक पड़ोसन बुढ़िया को ठग रही है, तो उन्होंने जोर की आंधी चला दी । इससे बुढ़िया ने गाय को घर के अंदर बांध लिया । सुबह होने पर उसने गाय के सोने के गोबर को देखा, तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही । अब वह गाय को भीतर ही बांधने लगी । उधर पड़ोसन ने ईर्ष्या से राजा को शिकायत कर दी, कि बुढ़िया के पास राजाओं के योग्य गाय है, जो सोना देती है । राजा ने यह सुन अपने दूतों से गाय मंगवा ली । बुढ़िया ने वियोग में, अखंड व्रत रखे रखा । उधर राजा का सारा महल गाय के गोबर से भर गया । राजा ने रात को उसे स्पने में गाय लौटाने को कहा । प्रातः होते ही राजा ने ऐसा ही किया । साथ ही पड़ोसन को उचित दण्ड दिया । राजा ने सभी नगर वासियों को व्रत रखने का निर्देश दिया । तब से सभी नगरवासी यह व्रत रखने लगे, और वे खुशियों को प्राप्त हुए ।

आरती

        कहुँ लगि आरती दास करेंगे, सकल जगत जाकि जोति विराजे ।। टेक ।। 
        सात समुद्र जाके चरण बसे, कहा भयो जल कुम्भ भरे हो राम ।
        कोटि भानु जाके नख की शोभा, कहा भयो मन्दिर दीप धरे हो राम ।
        भार उठारह रोमावलि जाके, कहा भयो शिर पुष्प धरे हो राम ।
        छप्पन भोग जाके नितप्रति लागे, कहा भयो नैवेघ धरे हो राम ।
        अमित कोटि जाके बाजा बाजे, कहा भयो झनकार करे हो राम ।
        चार वेद जाके मुख की शोभा, कहा भयो ब्रहम वेद पढ़े हो राम ।
        शिव सनकादिक आदि ब्रहमादिक, नारद मुनि जाको ध्यान धरें हो राम ।
        हिम मंदार जाको पवन झकेरिं, कहा भयो शिर चँवर ढुरे हो राम ।
        लख चौरासी बन्दे छुड़ाये, केवल हरियश नामदेव गाये ।। हो रामा ।।
    

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