ऋषि पंचमीभाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी कहते है। यह व्रत जाने अन्जाने मे हुये पापों के प्रक्षालन के लिये किया जाता है। यदि पंचमी तिथि चतुर्थी एवं षष्टी से संयुक्त हो तो ऋषि पंचमी का व्रत चतुर्थी से संयुक्त पंचमी को किया जाता है, न कि षष्ठीयुक्त पंचमी को। मुलतः यह व्रत केवल पुरुषों के लिए ही था, लेकिन अब यह स्त्रीयों के द्वारा भी किया जाता है। व्रत के दिन व्रत करने वाले को गंगा नदी या किसी अन्य नदी अथवा तालाब में स्नान करना चाहिये, यदि यह सम्भव न हो तो घर के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिये। तत्पश्चात पुजाघर या घर में पुर्व की ओर एक साफ-सुथरे स्थान को गोबर से लीपकर तांबे का जल भरा कलश रखकर अष्टदल कमल बनाएँ। उसके बाद सप्त ऋषियों की प्रतिमाओं को पंचामृत में नहलाना चाहिए, उन पर चन्दन लेप, कपूर लगाना चाहिए, पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों, अधिक मात्रा में नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए और मन्त्रों के साथ कथा सुननी चाहिए। इस व्रत में केवल शाकों का प्रयोग होता है और ब्रह्मचर्य का ही पालन किया जाता है। इसके करने से सभी तरह के पापों एवं दु:खों से छुटकारा मिलता है, और साथ साथ सौभाग्य की वृद्धि होती है। और अंत में ब्राह्मणों को भोजन करवाकर स्वयं भोजन करना चाहिए। स्त्रीयों के द्वारा यह व्रत करने से उन्हे आनन्द, शारीरिक सौन्दर्य, पुत्रों एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है।

यदि हम अपने प्राचीन शास्त्रों एवं ग्रंथो का अवलोकन करें तो उसमें ऋषि पंचमी के बारे में बहुत कुछ लिखा है, जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा यीधिष्ठिर को सुनायी गयी एक कथा भी है। जिसके अनुसार जब ब्रह्माजी नें त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का कठोर अपराध लगा। उस समय ब्रह्मा जी ने उस पाप को चार स्थानों में बांट दिया था। पहला अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों की बरसाती जल में, तीसरा पर्वतों में जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते है, और चौथा स्त्रीयों में रजस्वाला के रुप में विभाजित कर दिया। अत: मासिक धर्म के समय लगे पाप से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए।

इसका संकल्प यों है – अहं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा रजस्वलावस्यायां कृतसंपर्कजनितदोषपरिहारार्थमृषिपञ्चमीव्रतं करिष्ये। ऐसा संकल्प करके अरून्धती के साथ सप्तर्षियों की पूजा करनी चाहिए। अरून्धती के लिए भी मन्त्र है - अत्रेर्यथानसूया स्याद् वसिष्ठस्याप्यरून्धती। कौशिकस्य यथा सती तथा त्वमपि भर्तरि॥ यह मंत्र अरून्धती के आवाहन के लिए किया जाता है। यह व्रत सात वर्षों का होता है। सात घड़े होते हैं और सात ब्राह्मण निमन्त्रित रहते हैं, जिन्हें अन्त में ऋषियों की सातों प्रतिमाएँ (सोने या चाँदी की) दान में दे दी जाती हैं। यदि सभी प्रतिमाएँ एक ही कलश में रखी गयी हों तो वह कलश एक ब्राह्मण को तथा अन्यों को कलशों के साथ वस्त्र एवं दक्षिणा दान में दी जाती है।

 

पहली व्रत कथा

एक समय विदर्भ नामक देश में एक उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ रहा करता था। उसकी दो संताने थी एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम सुविभूषण था, जो अधिक बुद्धि वाला बुद्धिमान था, और पुत्री भी गुणवान और सुंदर थी। उत्तक ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण का घर-बार देखकर उस घर के ब्राह्मण के साथ कर दिया। भगवान की कृपा से ऐसा विधान बना कि, कुछ समय पश्चात् पुत्री विधवा हो गयी, और वापस आकर अपने अपने पिता के घर ही रहने लगी। अपनी कन्या को इस प्रकार दु:खी देखकर उत्तक अपने पुत्र को घर पर छोड़कर अपनी स्त्री व पुत्री को लेकर गंगा किनारे आश्रम बनाकर अपना जिवन व्यतीत करने लगा, और कन्या अपने माता-पिता की सेवा करने लगी।

एक दिन उत्तक ब्राह्मण की पुत्री काम करने के पश्चात् थक कर एक पत्थर की शिला पर आराम करने के लिए लेटी तो वह निद्रावस्था में चली गई। आधी रात में निद्रावस्था में ही उसके शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगे। अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े उत्पन्न देखकर उत्तक ब्राह्मण की स्त्री विलाप करके रोने लगी और रोते-रोते बेहोश हो गयी। उस ब्राह्मण स्त्री के होश में आने पर वह कन्या को उठाकर अपने पति उत्तक ॠषि के पास ले गई और, पुछने लगी कि उसकी पुक्त्री की हालत ऐसी क्यों हो गई? ब्राह्मणी की बात सुनकर उत्तक ॠषि ने अपने नेत्रों को बन्द करके कुछ पल के लिए ध्यान लगाया और तत्पश्चात् कहने लगे कि हमारी पुत्री पूर्व जन्म में ब्राह्मण कन्या थी। इसने एक बार रजस्वला होने पर घर के सब बर्तन आदि को छू लिये थे। इसके इस व्यवहार के कारण पाप लगा और बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं। शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री पहले दिन चान्डालनी, दूसरे दिन ब्रह्म हत्यारनी, तीसरे दिन पवित्र धोबिन के समान और चौथे दिन वह स्नान करने के पश्चात शुद्ध हो जाती है। शुद्ध होने के पश्चात् भी इसने अपनी सखियों के साथ ॠषि पंचमी का व्रत देखकर उसमें रूचि नहीं ली। मात्र व्रत के दर्शन से ही इसे इस जन्म में ब्राह्मण कुल प्राप्त हुआ। लेकिन इसके व्रत तिरस्कार करने से इसके शरीर में कीड़े पड़ गये। यदि वह शुद्ध मन से ऋषि पंचमी का व्रत करे, तो वह इन पापो से मुक्त हो सकती है। पिता की आज्ञा से उसकी पुत्री ने विधि पूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह दुखों से मुक्त हो गयी और अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य मिला। यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी। जो स्त्री रजस्वला होकर भी घर के कामों को करती है वह अवश्य ही नरक में जाती है।

 

दूसरी व्रत कथा

उसी विदर्भ नामक नगरी में एक बार श्येनजित नामक राजा हुये। वह ॠषियों के समान ही थे। उन्हीं के राज में सुमित्र नामक एक कृषक रहा करता था। उस कृषक की स्त्री जयश्री अत्यन्त गुणवान और पतिव्रता थी। एक समय वर्षा ॠतु में जब उसकी स्त्री खेती के कामों में लगी हुई थी तो वह रजस्वला हो गई। उसको रजस्वला होने का पता लग गया फिर भी वह घर के कामों में लगी रही। कुछ समय बाद वह दोनों स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी आयु भोग कर मृत्यु को प्राप्त हुए। दुसरे जन्म में जयश्री तो कुतिया बनीं और कृशक सुमित्र को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में आने के कारण बैल की योनी मिली। क्योंकि ॠतु दोष के अतिरिक्त इन दोनों का कोई अपराध नहीं था। इसी कारण इन दोनों को अपने पूर्व जन्म का समस्त विवरण याद रहा। वे दोनों कुतिया और बैल के रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहाँ रहने लगे। धर्मात्मा सुचित्र अपने अतिथियों का पूर्ण सत्कार करता था। अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मणों को जिमाने के लिये नाना प्रकार के भोजन बनवाये।

जब उसकी स्त्री किसी काम के लिए रसोई से बाहर गई हुई थी तो एक सर्प ने रसोई की खीर के बर्तन में विष वमन कर दिया। कुतिया के रूप में सुचित्र की माँ कुछ दूर से सब देख रही थी। पुत्र की बहू के आने पर उसने पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप से बचाने के लिए उस बर्तन में मुँह डाल दिया। सुचित्र की पत्नी चन्द्रवती से कुतिया का यह कृत्य देखा न गया और उसने चूल्हे में से जलती हुई लकड़ी निकाल कर कुतिया को दे मारी। बेचारी कुतिया मार खाकर इधर-उधर भागने लगी। चौके में जो झूठन आदि बची रहती थी, वह सब सुचित्र की बहू उस कुतिया को डाल देती थी। लेकिन क्रोध के कारण उसने वह भी बाहर फिकवा दीया। सब खाने का सामान फिकवा कर बर्तन साफ करा के दोबारा खाना बनाकर ब्राह्मणों को खिलाया। रात्रि के समय भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया बैल के रूप में रह रहे अपने पूर्व जन्म के पति के पास आकर बोली, हे स्वामी! आज तो भूख से मरी जा रही हूँ। वैसे तो मेरा पुत्र मुझे रोज खाने को देता था। लेकिन आज मुझे कुछ नहीं मिला। साँप के विष वाले खीर के बर्तन को अनेक ब्रह्महत्या के भय से छूकर उनके न खाने योग्य कर दिया था। इसी कारण उसकी बहू ने मुझे मारा और खाने को कुछ भी नहीं दिया। तब वह बैल बोला, हे भद्रे! तेरे पापों के कारण तो मैं भी इस योनी में आ पड़ा हूँ और आज बोझा ढ़ोते-ढ़ोते मेरी कमर टूट गई है। आज मैं भी खेत में दिनभर हल में जुता रहा। मेरे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और मुझे मारा भी बहुत। मुझे इस प्रकार कष्ट देकर उसने इस श्राद्ध को निष्फल कर दिया। अपने माता-पिता की इन बातों को सुचित्र सुन रहा था उसने उसी समय दोनों को भरपेट भोजन कराया और फिर उनके दुख से दुखी होकर वन की ओर चला गया। वन में जाकर ॠषियों से पूछा कि मेरे माता-पिता किन कर्मों के कारण इन नीची योनियों को प्राप्त हुए हैं और अब किस प्रकार से इनको छुटकारा मिल सकता है। तब सर्वतमा ॠषि बोले तुम इनकी मुक्ति के लिए पत्नी सहित ॠषि पंचमी का व्रत धारण करो तथा उसका फल अपने माता-पिता को दो। भादों महीने की शुक्ल पंचमी को मुख शुद्ध करके मध्यान्ह में नदी के पवित्र जल में स्नान करना और नये रेशमी कपड़े पहनकर अरूधन्ती सहित सप्तॠषियों का पूजन करना। इतना सुनकर सुचित्र अपने घर लौट आया और अपनी पत्नी सहित विधि विधान से पूजन व्रत किया। उसके पुण्य से माता-पिता दोनों पशु योनियों से छूट गये। इसलिये जो स्त्री श्रद्धापूर्वक ॠषि पंचमी का व्रत करती है वह समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर वैकुण्ठ जाती है।

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