रक्षाबंधन

रक्षाबंधनरक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। सावन में मनाए जाने के कारण इसे श्रावणी भी कहते हैं। रक्षाबंधन के त्योहार में राखी या रक्षासूत्र का महत्व सबसे अधिक है। राखी कच्चे सूत के धागे जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे तथा सोने-चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की होती है । सामान्यतः राखी के त्योहार में बहनें भाई को राखी बांधती हैं। लेकिन यह राखी के त्योहार को और भी तरिके से मनाया जाता है, जैसे बेटी अपने बाप को, शिष्य अपने गुरु को और औरतें उस आदमी को बाँध सकती है, जो कि उसकी रक्षा कर सके। कभी कभी सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच में भी मनाया जाता है।

प्रकृति संरक्षण के लिए वृक्षों को भी राखी बांधने की परंपरा का भी प्रारंभ हो गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरुष सदस्य परस्पर भाईचारे को बढाने के लिए एक दूसरे को भगवा रंग की राखी बांधते हैं। रक्षासूत्र को बांधते समय सभी आचार्य एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबंधन का सम्बन्ध राजा बलि के स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है। श्लोक में कहा गया है कि, जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा ।

 

अनुष्ठान विधि

रक्षाबंधनरक्षाबंधन के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर लड़कियाँ और महिलाएँ बहुत सारा पकवान बनाती हैं। तत्पश्चात पूजा की थाली रक्षाबंधन के लिए सजाती हैं। थाली में राखी के साथ साथ रोरी, हल्दी, चावल, दीपक, अगरबत्ती, मिठाई और कुछ पैसे भी होते हैं। बैठने के लिए साफ-सुथरा उपसुक्त स्थान तैयार करती है। तब उसी स्थान पर लड़के और पुरुष तैयार होकर टीका करवाने के लिए बैठते हैं। पहले अभीष्ट देवता की पूजा की जाती है, इसके बाद रोरी हल्दी से भाई का टीक करके चावल को टीके पर लगाया जाता है और सिर पर छिड़का जाता है। उसके बाद उसकी आरती उतारी जाती है, और दाहिनी कलाई पर राखी बांधी जाती है। उसके पैसों से न्यौछावर करके उन्हें गरीबों में बाँट दिया जाता है। भारत के अनेक प्रांतों में भाई के कान के ऊपर भोजली या भुजरियाँ लगाने की प्रथा भी है। इस भाई-बहन के त्योहार पर भाई बहन को उपहार या धन देता है। इस प्रकार रक्षाबंधन के अनुष्ठान के पूरा होने पर भोजन किया जाता है। हर त्योहार की तरह इस त्योहार में भी उपहारों और खाने-पीने का विशेष महत्व होता है । आमतौर पर दोपहर का भोजन महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस वक्त घर में परिवार सगे सम्बंधी सभी होते है। धर्म सम्प्रदाय देश होने के कारण भारत में रक्षाबंधन के अनुष्ठान के पूरा होने तक व्रत रखने की भी परंपरा है। इस दिन पुरोहित तथा आचार्य सुबह सुबह ही यजमानों के घर पहुंचकर उन्हें राखी बांधते हैं और बदले में धन वस्त्र और भोजन आदि प्राप्त करते हैं। यह पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इसका सामाजिक महत्व तो है ही साथ ही साथ यह धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फ़िल्में भी इससे अछूते नहीं हैं ।

 

सामाजिक प्रसंग

रक्षाबंधनरक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बांधकर उसके माथे पर रोरी, हल्दी और चावल से तिलक करती हैं और दीपक से आरती करके उनकी दीर्घ आयु की कामना करती हैं। उसके बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बंधन को मज़बूत करते है। तत्पश्चात भाई बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाकर सुख दुख में साथ रहने का भरोसा दिलाते हैं। यह एक ऐसा पावन पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है।

सगे भाई बहन के अलावा अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पावन पर्व से बंधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से भी परे होते हैं। रक्षाबंधन का पर्व भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के निवास पर भी मनाया जाता है। जहाँ छोटे बच्चे उन्हें राखी बाँधते हैं। रक्षाबंधन आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मज़बूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन भाई को ही नहीं अन्य संबंधों में भी राखी बांधने के प्रचलन है। गुरू शिष्य को रक्षासूत्र बाँधता है तो शिष्य गुरू को। भारत में प्राचीन काल में जब स्नातक अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात गुरुकुल से विदा लेता था तो वह गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसे रक्षा सूत्र बाँधता था, जबकि गुरु अपने विद्यार्थी को इस कामना के साथ रक्षासूत्र बाँधता था कि उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है वह अपने भावी जीवन में उसका समुचित ढंग से प्रयोग करे ताकि वह अपने ज्ञान के साथ-साथ गुरु की गरिमा की रक्षा करने में भी सफल हो सके। इसी परंपरा के अनुरूप आज भी किसी धार्मिक विधि विधान से पूर्व पुरोहित यजमान को रक्षा सूत्र बाँधता है और यजमान पुरोहित को। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के सम्मान की रक्षा करने के लिए परस्पर एक दूसरे को अपने बंधन में बाँधते हैं।

रक्षाबंधन पावन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता और एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहन पराए घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं दूरदराज के भाइयों तक को रक्षा बांधती है और इस प्रकार अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है और साथ साथ दो परिवारों का और कुलों का जु़डाव भी होता है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एकसूत्रता के रूप में इस पावन पर्व का उपयोग किया जाता है। इस पावन पर्व के सहारे जो कड़ी टूट गई है उसे फिर से जागृत किया जा सकता है। रक्षाबंधन के अवसर पर कुछ विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं जैसे घेवर, शकरपारे, नमकपारे और घुघनी। घेवर को सावन का विशेष मिष्ठान माना जाता है, यह केवल हलवाई ही बनाते हैं जबकि शकरपारे और नमकपारे आमतौर पर घर में ही बनाए जाते हैं। घुघनी बनाने के लिए काले चने को उबालकर चटपटा छौंका जाता है। इसको पूरी और दही के साथ खाते हैं। हलवा और खीर भी इस पर्व के लोकप्रिय पकवान हैं।

 

धार्मिक प्रसंग

उत्तरांचल में इसे श्रावणी के नाम से जाना जाता हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ॠषि-तर्पणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। ब्राह्मणों का यह सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है। वृत्तिवान् ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं। अमरनाथ की अतिविख्यात और पावन धार्मिक यात्रा गुरुपूर्णिमा से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन के दिन समाप्त होती है। कहते हैं इसी दिन यहाँ का हिमानी शिवलिंग भी पूरा होता है। इस दिन अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेला भी लगता है।

महाराष्ट्र राज्य में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन महाराष्ट्र के लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और नदी या समुद्र की पूजा करते हैं। इसी अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिए नारियल अर्पित करने की परंपरा भी है। यही कारण है कि इस मुंबई के समुद्र तट नारियल के फलों से भर जाते हैं।

राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बांधने का रिवाज़ है। रामराखी सामान्य राखी से अलग तरह की होती है। इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुंदना लगा होता है। यह केवल भगवान को बांधी जाती है। चूड़ा राखी भाभियों की चूड़ियों में बाँधी जाती है। जोधपुर में राखी के दिन केवल राखी ही नहीं बाँधी जाती, बल्कि दोपहर में पद्मसर और मिनकानाडी पर गोबर, मिट्टी और भस्मी से स्नान कर शरीर को शुद्ध किया जाता है। इसके बाद धर्म तथा वेदों के प्रवचनकर्ता अरुंधती, गणपति, दुर्गा, गोभिला तथा सप्तर्षियों के दर्भ के चट (पूजास्थल) बनाकर मंत्रोच्चारण के साथ पूजा करते हैं। उनका तर्पण कर पितृॠण चुकाया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान करने के बाद घर आकर हवन किया जाता है। वहीं रेशमी डोरे से राखी बनाई जाती है। राखी में कच्चे दूध से अभिमंत्रित करते हैं और इसके बाद भोजन का प्रचलन है।

तमिलनाडु, केरल, और उड़ीसा के दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणों के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन नदी या समुद्र के तट पर स्नान करने के बाद ऋषियों का तर्णण कर नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। गये वर्ष के पुराने पापों को पुराने यज्ञोपवीत की भांति त्याग देने और स्वच्छ नवीन यज्ञोपवीत की भांति नया जीवन प्रारंभ करने की प्रतिज्ञा ली जाती है। इस दिन यजुर्वेदीय ब्राह्मण 6 महीनों के लिए वेद का अध्ययन प्रारंभ करते हैं। इस पर्व का एक नाम उपक्रमण भी है जिसका अर्थ है नई शुरूआत व्रज में हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) से श्रावणी पूर्णिमा तक समस्त मंदिरों एवं घरों में ठाकुर झूले में विराजमान होते हैं। रक्षाबंधन वाले दिन झूलन दर्शन समाप्त होते हैं।

 

पौराणिक प्रसंग

राखी का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन है कि देव और दानवों में जब युध्द शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर के अपने पति के हाथ पर बांध दिया। वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि, इंद्र इस लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्ति से विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है।

स्कन्धपुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है कि दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थ्रना की। तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राम्हण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा अकाष पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकानाचूर कर देने के कारण यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं कि जब बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान बलि को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। विष्णुपुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भागवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। भागवान विष्णु का हयग्रीव अवकार विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

 

ऐतिहासिक प्रसंग

राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हे विजयश्री के साथ वापस ले आएगा। राखी के साथ एक और प्रसिद्ध कहानी जुड़ी हुयी है। कहते हैं, मेवाड़ की महारानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्वसूचना मिली । रानी लड़ऩे में असमर्थ थी । उसने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की। कहते है सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया । पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवदान दिया।

महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव, युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को पार कैसे कर सकता हूँ तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति बीपदा से बहार आ सकते हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बांधने के उल्लेख मिलते हैं। महाभारत में ही रक्षाबंधन से संबंधित कृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तांत मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबंधन के पर्व में यहीं से आन मिली।

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