गुरू पुर्णिमा

गुरू पुर्णिमाअगर हम प्राचीन ग्रंथो और शास्त्रों का अध्ययन करें तो, आज भी हमें गुरु महिमा का मार्मिक वर्णन मिलता है। मुलतः गुरु शब्द दो अक्षरों का मिलाकर बनाया गया है – 'गु' और 'रु' । 'गु' का अर्थ 'अंधकार' और 'रु' का अर्थ 'अंधकार का हटाने वाला' बताया गया है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है, अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण कर, धर्म का मार्ग दिखाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

गुरू पूर्णिमा की महिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा से जुडी हैं। शास्त्रों में गुरु पूजा का विधान आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ही है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर चारो तरफ ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न ज्यादा गर्मी और न ज्यादा सर्दी, चारो तरफ हरियाली और वर्षा की छोटी छोटी बुंदों का चारो तरफ आनंद ही आनंद रहता है। इसलिए ये महिने अध्ययन के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं। गुरु पूजन का मन्त्र है:

गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर: । गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम: ।।

अपनी महत्ता के कारण गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा पद दिया गया है। शास्त्र वाक्य में ही गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु को ब्रह्मा कहा गया क्योंकि वह शिष्य को बनाता है नव जन्म देता है। गुरु, विष्णु भी है क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है गुरु, साक्षात महेश्वर भी है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार भी करता है।

वैसे तो गुरु तत्व की प्रशंसा सभी शास्त्रों में की गई है। ऐसा माना जाता है कि, ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किन्तु गुरु के लिए कोई भी प्रकार का मतभेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका है। सभी धर्मों में गुरु को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। आदर सम्मान के दृष्टीकोण से हर गुरु ने दूसरे गुरुओं को आदर सम्मान एवं पूजा सहित सम्पुर्ण मान दिया है। भारत के बहुसम्प्रदाय धर्म तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं। गुरु ने जो नियम बताए हैं उन नियमों का श्रद्धा से पालन करना और उन्ही नियमों पर चलना संप्रदाय के शिष्य का परम कर्तव्य और धर्म है। गुरु का कार्य सिर्फ उनके शिष्यों को उचित शिक्षा प्रदान करवाना ही नही बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को हल करना भी है।

गुरु की भूमिका भारत में केवल सिर्फ आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को समय पर उचित सलाह देकर, इस देश को विपदा से उबारा भी है। अर्थात अनादिकाल से ही गुरु का शिष्य का हर क्षेत्र में मार्गदर्शित योगदान रहा है। अतः सद्गुरु की इसी महिमा के कारण उनका व्यक्तित्व हमेशा माता-पिता से ऊपर रहा है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक के अनुसार 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरु' अर्थात जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी होनी चाहिए। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

संत कबीर ने यहाँ तक कहा है कि, भगवान के रूठने पर गुरू की शरण हमारी रक्षा कर सकती है किंतु गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना असम्भव है। जिसे ब्राह्मणों ने आचार्य, बौद्धों ने कल्याणमित्र, जैनों ने तीर्थंकर और मुनि, नाथों तथा वैष्णव संतों और बौद्ध सिद्धों ने उपास्य सद्गुरु कहा है। उस श्री गुरू से उपनिषद् की तीनों अग्नियाँ भी थर-थर काँपती हैं। त्रोलोक्यपति भी गुरू का गुणनान करते है। ऐसे गुरू के रूठने पर कहीं भी ठौर ठीकान नहीं मिल सकता है। सद्गुरु की महिमा बहुत अपरंपार है। उन्होंने शिष्य पर अनंत उपकार किए है। उसने विषय वासनाओं से बंद शिष्य की बंद आँखों को ज्ञानचक्षु द्वारा खोलकर उसे शांत ही नहीं बल्कि अनंत तत्व ब्रह्म का दर्शन भी कराया है।

अतः सद्गुरु की महिमा तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी गाते है, इनके सामने हम जैसे मनुष्य की बिसात क्या। इसी के साथ दुनिया के समस्त गुरुओं को मेरा नमन।

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