श्री गणेश चतुर्थी

श्री गणेश चतुर्थीभाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को ही श्री गणेश चतुर्थी कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को मध्याह्न के समय श्री गणेशजी का जन्म हुआ था। शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण तिथि बताया गया है, जबकि गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को हुआ था। देवसमाज में इन्हें सर्वोच्च और सर्वोपरी स्थान प्राप्त है। भारतीय संस्कृति के अनुसार भगवान श्री गणेशजी की पुजा बुद्धि, समृद्धि, सौभाग्य और किसी भी शुभ कार्य के करने के पहले की जाती है। श्री गणेशजी भगवान को बुद्धि के देवता और विघ्नों का विनाशक माना गया हैं। मोदक (लड्डू) इनका सर्वप्रिय भोग है, और चूहा इनका प्रिय वाहन है। इनकी शादी ऋद्धि तथा सिद्धि नामक दो स्त्रियों के साथ हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि, इस दिन के रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है।

गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व मराठा साम्राज्य के पूर्व राज्यों तक ही सिमित थे, लेकिन अब यह पुरे देश भर में बडी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह महाराष्ट्र और गोवा में कोंकणी लोगों का सबसे बड़ा त्योहार है। गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के अलावा भारत के सभी राज्यों में यह त्योहार बडी धुम-धाम से मनाया जाता है। भारत के अलावा श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में भी यह त्योहार पुरे धुम-धाम और बडी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

 

गणेश जी का जन्म

शिवपुराण के अन्तर्गत रुद्रसंहिता के चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि, एक बार माता पार्वती ने स्नान करने जा रही थीं। उस समय वह चाहती थी स्नान करते वक्त उन्हे कोई परेशान न करें। तब उसी समय उन्होने स्नान से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने के आदेश के साथ स्नान करने चली गयीं। उसी समय भगवान शिवजी आये और जब अन्दर प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। लाख समझाने पर भी उस बालक ने उन्हे अन्दर जाने नहीं दिया। इस पर शिवगणों ने भगवान शिवजी के कहने पर उस बालक को द्वार से हटाने के लिए उससे भयंकर युद्ध किया। परंतु इस संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। अपने पुत्र का कटा हुआ सिर देखकर भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने अपने पुत्र को वापस जिवित न होने पर प्रलय करने की ठान ली। यह सब देखकर सारे देवी-देवता भयभीत हो गये। देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति कर माता भगवती को शांत किया और फिर सभी देवी-देवताओं ने मिलकर उस बालक को वापस से जिन्दा करने का अनुराध भगवान शिवजी से किया। समस्या यह थी कि कटा हुआ सिर वापस से धड के साथ जुड नही सकता था। और फिर यह तय हुआ कि अगर किसी दुसरे जिव का सिर मिल जाए तो यह बालक वापस से जिन्दा हो जाएगा।

श्री गणेश चतुर्थीभगवान शिवजी ने शिवगणों को उत्तर दिशा में जाने का आदेश दिया और साथ में यह भी कहा कि, ऐसे जिव का सिर लेकर आना जिसकी माता उसकी तरफ पिठ करके सोई हो। इसी कथन के अनुसार शिवगणों को एक जंगल में एक हाथी का बच्चा मिला, जिसकी माँ उसके करफ पीठ करके सोई थी। यह देखकर शिवगणों उस हाथी के बच्चे का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने उस गज के कटे हुए मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्य होने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी।

कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्ष पर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

 

चंद्र दर्शन दोष से बचाव

प्रत्येक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चन्द्रमा के दर्शन के पश्चात्‌ व्रत करने वाले को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन को निषिद्ध माना गया है। जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है। इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ करने से झुठा कलंक दोष मिट जाता है - 'सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥'

 

गणेशोत्सव

वैसे तो यह त्योहार पूरे भारत में मनाया जाता है, किन्तु महाराष्ट्र का गणेशोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र में भी पुणे का गणेशोत्सव जगत्प्रसिद्ध है। यह उत्सव, हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतुर्दशी (चार तारीख से चौदह तारीख तक) तक दस दिनों तक चलता है। महाराष्ट्र में इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजा जाता है। दक्षिण भारत में इनकी विशेष लोकप्रियता कला शिरोमणि के रूप में है। गणेश हिन्दुओं के आदि आराध्य देव भी है। हिन्दू धर्म में गणेश को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है। कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो इसलिए शुभ के रूप में गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है। महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथमा चलायी थी। छत्रपति शिवाजी महाराज भी श्री गणेश की उपासना करते थे।

 

इतिहास

कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थपना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणोत्सव को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक के प्रयास से पहले गणेश पूजा परिवार तक ही सीमित थी। गणेश पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सन् 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक पौधरोपण किया था वह अब विराट वट वृक्ष का रूप ले चुका है। वर्तमान में केवल महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी संख्या में गणेशोत्सव मंडल है।

 

स्वतंत्रता संग्राम और गणेशोत्सव

वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नाशिक में मित्रमेला नामक एक संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम था देशभक्ति पूर्ण पोवाडे (मराठी लोकगीतों का एक प्रकार) आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। इस संस्था के पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में काफी धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए लोगों उमड़ पड़ते थे। राम-रावण कथा के आधार पर वे लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। उनके बारे में वीर सावरकर ने लिखा है कि कवि गोविंद अपनी कविता की अमर छाप जनमानस पर छोड़ जाते थे। गणेशोत्सव का उपयोग आजादी की लड़ाई के लिए किए जाने की बात पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। बाद में नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का नया ही आंदोलन छेड़ दिया था। अंग्रेज भी इससे घबरा गये थे। इस बारे में रोलेट समिति रपट में भी चिंता जतायी गयी थी। रपट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेजी शासन विरोधी गीत गाती हैं व स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता है। गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे - वीर सावकर, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्ट चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू।

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